विषय: जल स्रोतों की पवित्रता और उन्हें कूड़े से बचाना (Clean Water Bodies)
अवधि: लगभग 10-12 मिनट
पात्र:
1. सूत्रधार/एंकर (Sutradhar): जो माहौल बनाता है।
2. गंगा राम (Ganga Ram): एक लापरवाह व्यक्ति जो नदी को डस्टबिन समझता है।
3. जल देवी (Jal Devi): नदी/पानी की देवी (एक मज़ेदार पोशाक में)।
4. डॉक्टर साफ–सफाई (Dr. Saf-Safai): जो बीमारियों के बारे में बताता है।
5. पप्पू (Pappu): एक जागरूक बच्चा।
दृश्य 1: गंगा राम और ‘जल देवी‘ की मुलाकात (हास्यपूर्ण परिचय)
(जगह: नदी/झील का किनारा। ‘जल देवी‘ (Jal Devi) नदी के प्रतीक के रूप में नीले कपड़े और अजीब–सीगंदी चीज़ों जैसे खाली पैकेट और प्लास्टिक से सजी हुई उदास खड़ी है।)
(सूत्रधार ज़ोरदार आवाज़ में आता है।)
सूत्रधार:
अरे लोगों! ज़रा देखो तो! ये कौन है, जो उदास खड़ी है?
क्या कोई ब्यूटी क्वीन है, या किसी फिल्म की हीरोइन बड़ी है?
मिलिए, ये हैं हमारी ‘जल देवी’, पर ये इतना मुँह क्यों फुलाए हैं?
देवी जी! क्या बात है, क्यों इतना गुस्सा दिल में दबाए हैं?
जल देवी (धीमे और दुखी स्वर में):
क्या बताऊँ भाई? पहले लोग मुझे ‘माँ’ कहते थे, पूजा करते थे!
आज-कल मुझे ‘कचरा दान’ समझते हैं! (वह अपने ऊपर लगे प्लास्टिक को झाड़ती है।)
मेरा तो हाल ऐसा हो गया है कि अगर किसी ने नहाने की हिम्मत की, तो उसे सीधे त्वचा रोग का सर्टिफिकेट मिलेगा!
(तभी गंगा राम (Ganga Ram) आता है। उसके हाथ में पूजा का सामान, पुराने कपड़े, और एक बड़ाप्लास्टिक का थैला है।)
गंगा राम (आवाज़ थोड़ी मोटी):
अरे! ये कौन बोल रहा है? हाँ… आज शनिवार है! पुरानी चीज़ें नदी को अर्पित करने का दिन है!
(वह थैले से एक फटा हुआ जूता और एक पॉलीथीन निकालकर नदी में फेंकने लगता है।)
जल देवी (चिल्लाकर):
ए गंगा राम! रुक जा! बस कर! और क्या-क्या डालेगा? मेरा पेट फट जाएगा!
गंगा राम (चौंककर):
अरे! ये कौन बोल रहा है? भूत? प्रेत? देवी?
जल देवी:
मैं तेरी ‘जल देवी’ हूँ! ये तू क्या कर रहा है? धूप दीप , पुराना तेल, पॉलिथीन… ये सब मेरे लिए प्रसाद है?
गंगा राम:
अरे माँ! ये तो ‘विसर्जन’ है! सब पाप धुल जाते हैं! और ये गन्दगी… ये तो सरकार का काम है साफ़ करना!
जल देवी:
पाप तो धुलेंगे नहीं, हाँ! बीमारी ज़रूर फैल जाएगी! तूने मुझे डस्टबिन बना दिया है!
दृश्य 2: डॉक्टर साफ–सफाई की चेतावनी और पप्पू का ज्ञान
(तभी, डॉक्टर साफ–सफाई (Dr. Saf-Safai) एक बड़ा स्टेथोस्कोप और अजीब–सा चश्मा लगाकर भागते हुए आतेहैं।)
डॉक्टर साफ-सफाई:
रुक जाओ! रुक जाओ! इमरजेंसी! नदी में कूड़ा फेंकना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है!
गंगा राम:
डॉक्टर साहब! आप कौन?
डॉक्टर साफ-सफाई:
मैं हूँ डॉक्टर साफ-सफाई! जल देवी को देखकर मुझे हैजा (Cholera) और टायफाइड (Typhoid) की बदबू आ रहीहै!
(वह गंगा राम को देखते हैं।)
गंगा राम जी! आपको पता है? आप जिस पानी में कूड़ा डाल रहे हैं, घूम-फिरकर वही पानी आपके घर में आता है।जब आप नदी को गंदा करते हैं, तो आप किसे बीमार कर रहे हैं?
गंगा राम:
किसे?
डॉक्टर साफ-सफाई:
खुद को! बीमारियों को न्योता दे रहे हैं! जब ये प्लास्टिक और केमिकल पानी में घुलते हैं, तो ये पानी ‘पवित्र’ नहींरहता, ज़हर बन जाता है!
(तभी पप्पू (Pappu) नाम का एक छोटा बच्चा आता है।)
पप्पू:
हाँ, डॉक्टर अंकल सही कह रहे हैं! हमारे टीचर ने बताया था!
नदियाँ हमारी धरोहर हैं, ये किसी डस्टबिन के लिए नहीं बनी हैं!
अगर हम इन्हें साफ़ नहीं रखेंगे, तो कल को पीने के लिए एक बूँद साफ़ पानी भी नहीं मिलेगा! फिर हम क्या करेंगे? कोल्ड ड्रिंक पीएँगे क्या?
(पप्पू अपने हाथ से एक छोटा–सा पैकेट उठाता है जो गंगा राम ने फेंका था और उसे अपनी जेब में रख लेता है।)
पप्पू:
इसे मैं कूड़ेदान में डालूँगा! पानी में नहीं!
दृश्य 3: माफी और संकल्प (भावनात्मक मोड़ और निष्कर्ष)
(गंगा राम को अपनी गलती का एहसास होता है।)
गंगा राम (शर्मिंदा होकर):
ओह! मैं तो बहुत बड़ी गलती कर रहा था! जल देवी को दुःख दे रहा था! और बीमारियों को अपने घर बुला रहा था!
(वह जल देवी के सामने हाथ जोड़ता है।)
माँ, मुझे माफ़ कर दो! मैं आज से कभी भी कूड़ा पानी में नहीं फेंकूँगा! न प्लास्टिक, न पुराना कपड़ा, न ही पूजा कासामान!
जल देवी:
(अब मुस्कुराते हुए):
माफ़ी मिल गई! पर सिर्फ़ वादा नहीं! काम चाहिए!
सूत्रधार:
तो सुनो भाई! ये कोई साधारण पानी नहीं है! ये हमारा जीवन है!
(सभी पात्र एक साथ दर्शकों की ओर मुँह करके बोलते हैं।)
डॉक्टर साफ-सफाई:
याद रखो! पानी पवित्र है, कूड़ा दान नहीं!
पप्पू:
कूड़ा हमेशा कूड़ेदान में डालो!
गंगा राम:
विसर्जन के लिए सही जगह का इस्तेमाल करो!
जल देवी:
मुझे स्वच्छ रखो, मैं तुम्हें स्वस्थ रखूँगी!
(अंतिम नारा, ज़ोरदार आवाज़ में।)
सभी:
“पानी बचाओ, सफ़ाई फैलाओ! स्वस्थ जीवन, अपनाओ!