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नुक्कड़ नाटक: कम्पोस्ट की जंग, गली रंगीली!

पात्र:

• सूत्रधार: arun, जो नाटक का वर्णन करता है और लोगों को हँसाता है।

• पड़ोसी (रमेश): एक युवा, बेपरवाह लड़का जो कचरा कहीं भी फेंकता है। वह थोड़ा लापरवाह है।

• समझदार गृहिणी (सुनीता): एक जागरूक महिला, जो थोड़ी तेज-तर्रार है और रमेश को सबक सिखाने में माहिर है।

• सफाई वाला (काका): एक अनुभवी सफाई कर्मचारी जो बीच-बीच में अपनी बातें कहते हैं।

• दोतीन और पात्र (गली के लोग): भीड़ का हिस्सा बनते हैं।

(नाटक की शुरुआत एक फिल्मी गाने की धुन पर होती हैजिसे कलाकार अपने अंदाज में गाते हैं)

सभी कलाकार:

• 🎶 (गाना) देखो-देखो ये गली है हमारी,

• कचरा फैला के हमने, हालत है बिगाड़ी।

• बीमारियों से अब है परेशानी,

• जागो रे जागो, ये बात है बतानी!

वाहवाह!

(सूत्रधार (arunआगे आता है)

• Arun :
वाह भई वाह! बहुत अच्छा गाया!
तो दोस्तों, स्वागत है आपका गली रंगीली में।
यहाँ हर तरह के रंग हैं, पर सबसे गहरा रंग है,
कचरे का रंग!
और इस कचरे के रंग को बदलने आ रहे हैं हमारे दो कलाकार,
एक हैं हमारे रमेश बाबू, जो घर का कचरा फेंकने से पहले कुछ सोचते ही नहीं…
और दूसरी हैं, गली की शेरनी, सुनीता बहन!

(रमेशएक बड़े से थैले में कचरा लेकर आता है उसमें से कुछ छिलके और गंदा पानी टपक रहा हैवह गली के कोने में जाता है)

• रमेश:
(थैला हवा में उछालते हुए) lo भई, roz roz itna kachra ( kachra fekte hue )

(तभी सुनीताअपने गमले में पानी डालते हुए उसे देखती है वह रमेश के पास जाती हैहाथ में झाड़ूलिए हुए)

• सुनीता:
अरे रमेश bhaiya ! क्या कर रहे हो?
ye apne ghar ke kachre ki badbu saare mohalle ko kyu sunga rhy ho गीले कचरे कातड़का, गली में क्यों लगा रहे हो?

• रमेश:
अरे भाभी जी! Ek toh आपका bhi रोज का है apna kaam kijiye na।
सुबह-सुबह दिमाग का कचरा साफ करने आ जाती हैं।

यह तो कचरा है, कचरा कहीं भी फेंको, आखिर में जाना तो एक ही जगह है।

• सुनीता:
क्या कहा? जाना तो एक ही जगह है?
अगर सारा कचरा एक जगह जाएगा, तो हमारे शहर का क्या होगा?
कचरे के पहाड़ बनेंगे, बदबू फैलेगी और bimariyan , wo alag…

(रमेश हाथमुँह हिलाते हुए कहता है)

• रमेश:
अरे Bhabhi ji इतना दिमाग मत लगाओ!
एक ही जिंदगी मिली है, आराम से जीने दो।
मैं तो कहता हूँ, जो मन में आए करो।

(तभी सफाई वाला काका वहाँ आते हैं वह थके हुए हैं)

• काका:
अरे, ये क्या हो रहा है?
ye kya फिर से वही कचरा-कचरा। ( pointing towards the garbage ) 
बेटा, तुम लोग कचरा फैलाते हो और मैं रोज-रोज साफ करता हूँ।
अगर तुम लोग गीला-सूखा अलग करो, तो मेरा bhi काम भी आसान हो jayega।

• (सुनीता फिर से रमेश को समझाती है)

• सुनीता:
सुनो रमेश! Tumhe pta bhi hai ये गीला कचरा kitne kaam ka
इससे हम खाद बना सकते हैं।

अपने घर के पौधों के लिए।

• रमेश:
अरे bhabhi! इतना झंझट कौन करेगा?
एक डिब्बा लाओ, उसमें डालो, फिर मिट्टी डालो,
फिर इंतजार करो, अरे बाप रे बाप!
जितनी देर में खाद बनेगी, उतनी देर में तो मैं चार बार कचरा फेंक आऊँगा।

(अचानक से arun बीच में आता है)

• Arun :
अरे-अरे, रमेश बाबू!
इतना भी क्या आलस?
अरे देखो, सुनीता भाभी की मेहनत,

और ये देखो, उनका बगीचा!

(सुनीता अपने घर के बगीचे को इशारा करती है कुछ पौधे और फूल दिखाई देते हैं)

रमेश:
वाह! फूल तो बहुत अच्छे हैं।
पर इतना सब कुछ कौन करे?

• रमेश:
हे भगवान! मैं कितना बड़ा बेवकूफ था।
माफी भाभी जी! आपकी बात में दम toh है।
अब से मैं भी गीला-सूखा kachra alag अलग करूँगा।

• (रमेश खुशीखुशी अपनी पॉलिथीन वापस ले जाता हैऔर सुनीता अपने डस्टबिन का डेमो देती है)

• सुनीला:
देखा! कितना आसान है।
बस थोड़ी सी जागरूकता की जरूरत है।
और हाँ रमेश, ( haste hue ) तेरा आलस दूर करना,
मेरा पहला काम है।

(सभी कलाकार एक साथ आते हैं और एक जोरदार नारा लगाते हैं)

सभी कलाकार:

• कचरा नहीं है अब अभिशाप,

• बनेगी खाद, मिटेगा पाप!

• गीला-सूखा अलग करो!

• कम्पोस्टिंग को अपनाओ!

• स्वच्छ भारत का सपना सच बनाओ!

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